Hum suurat-e-janaaN bhuul gaye…Majaz

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Asrar-ul Haq Majaz’s famous ghazal

kuchh tujh ko hai Khabar hum kyaa kyaa aye shorish-e-dauraaN bhuul gaye
woh zulf-e-pariishaaN bhuul gaye, woh diida-e-giryaaN bhuul gaye

    Majaz Lakhnavi's

    कुछ तुझ को है ख़बर हम क्या क्या ऐ शोरिश-ए-दौरां भूल गए
    वह ज़ुल्फ़-ए-परीशां भूल गए, वह दीद-ए-गिरयां भूल गए

    ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं
    ऐ ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या किजिए हम सूरत-ए-जानां भूल गए

    अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं अब दिल की कली खिलती ही नहीं
    ऐ फ़स्ले बहारां रुख़्सत हो, हम लुत्फ़-ए-बहारां भूल गए

    सब का तो मदावा कर डाला अपना ही मदावा कर न सके
    सब के तो गिरेबां सी डाले, अपना ही गिरेबां भूल गए

    यह अपनी वफ़ा का आलम है, अब उनकी जफ़ा को क्या कहिए
    एक नश्तर-ए-ज़हरआगीं रख कर नज़्दीक रग-ए-जां भूल गए

    मजाज़ लखनवी


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