ना किसी की आंख का नूर हूं ना किसी के दिल का क़रार हूं
जो किसी के काम ना आ सके मैं वो मुश्त-ए-ग़ुबार हूं
मैं नहीं हूं नग़्म-ए-जां-फ़िज़ा, मुझे कोई सुन के करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूं सदा, मैं बड़े दुखी की पुकार हूं
मेर रंग रूप बिगड़ गया, मेरा बख़्त मुझसे बिछड़ गया
जो चमन ख़िज़ां से उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ले बहार हूं
पै फ़ातेहा कोई आए क्यूं, कोई चार फूल चढ़ाए क्यूं
कोई शमा ला के जलाए क्यूं कि मैं बेकसी का मज़ार हूं
ना मैं मुज़तर उनका हबीब हूं, ना मैं उनका रक़ीब हूं
जो पलट गया वह नसीब हूं जो उजड़ गया वह दयार हूं
मुज़तर ख़ैराबादी
(यह मशहूर ग़ज़ल अक्सर बहादुर शाह ज़फ़र
के नाम से मंसूब कर दी जाती है इसकी वजह फ़िल्म-वालों
और मौसीक़ी-कारों का मुख़्त्लिफ़ ग़ज़लों के अशआर जोड़ कर
अपनी सहूलियत के लिये आसान ज़बान का गाना बना लेने
की आद्त है, ज़ाहिर है इन तख़्लीक़ात का कोई कापीराईट
तो है नहीं और अदबी तख़्लीक़ात के साथ छेड़ छाड़ ऐसी ही
सगीन ग़लत्फ़हमियां पैदा करती हैं)
Na kisi ki aankh ka nuur huuN, na kisii ke dil ka qaraar huun….Muztar Khairabadi’s ghazal is a classic often mistaken as Bahadur Shah Zafar’s ghazal.
To read it in English, the confusion about it and Muztar’s history, click http://indscribe.blogspot.com/2006/07/na-kisii-ke-dil-ke-nuur-huunnot.html
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